
शुरुआत — यह मेरा अपना obituary है
देखो, मैं सड़सठ साल का हो गया हूँ और अब अपनी ही जीवनी लिखने बैठा हूँ। मतलब यह है कि मैं ख़ुद अपना obituary — यानी मरने के बाद छपने वाली जीवन-कहानी — अभी ज़िंदा रहते लिख रहा हूँ।
क्यों? इसलिए कि मुझे लगता है — जो लोग अभी कुछ खोजने में लगे हैं, उन्हें यह जानना चाहिए कि जिस आदमी ने पहले खोजा, उसे वो सफ़र कैसा लगा।
पर एक दिक़्क़त है। जब आप पीछे मुड़कर देखते हैं, तो आज की नज़र से पुरानी बातें देखते हैं। जो आदमी मैं सड़सठ साल में हूँ, वो बीस साल में नहीं था। तो हर याद थोड़ी रंगी हुई होती है — आज के रंग से।
फिर भी, अपनी कहानी में कुछ ऐसा होता है जो कोई दूसरा नहीं बता सकता। तो चलो, कोशिश करते हैं।
पहला सवाल — इस दौड़ में क्या मिलेगा?
जब मैं अभी छोटा ही था — यानी जवान, पर थोड़ा ज़्यादा सोचने वाला — तब मुझे एक बात बहुत साफ़ दिख गई थी।
ज़्यादातर लोग एक दौड़ में लगे रहते हैं। नाम चाहिए, पैसा चाहिए, इज़्ज़त चाहिए। सारी ज़िंदगी इसी दौड़ में निकल जाती है।
और सबसे बड़ी मुसीबत यह है कि इस दौड़ में हिस्सा लेना मजबूरी है। पेट जो भरना है। तो पेट तो भर जाता है — पर जो इंसान के अंदर एक सोचने-समझने वाला हिस्सा है, वो अधूरा रह जाता है।
पहले मैंने धर्म की तरफ़ देखा। मेरे माँ-बाप बिल्कुल धार्मिक नहीं थे। फिर भी स्कूल और समाज से धर्म घुस ही जाता है। तो बारह साल की उम्र तक मैं भी धार्मिक था — गहरे तौर पर।
और फिर बारह साल में सब टूट गया। विज्ञान की कुछ किताबें पढ़ीं — और लगा कि बाइबल में बहुत कुछ सच नहीं हो सकता। एक झटके में जैसे पर्दा हट गया।
उसके बाद सत्ता पर से भरोसा उठ गया। जो भी "यह मानना ज़रूरी है" वाली बात थी — उस पर शक होने लगा। यह शक मेरे साथ ज़िंदगी भर रहा।
दूसरा रास्ता — बाहर की दुनिया
धर्म का रास्ता बंद हुआ तो दूसरा खुला।
मैंने देखा कि यह जो दुनिया है — यह हमारे बिना भी मौजूद है। हम न हों, पर सूरज उगेगा। हम न हों, पर गुरुत्वाकर्षण काम करेगा। यह दुनिया एक विशाल पहेली की तरह सामने खड़ी है। और इसे — कम से कम थोड़ा-थोड़ा — समझा जा सकता है।
यह विचार बहुत गहरी राहत देता था। अपने छोटे-छोटे डर, अपनी उम्मीदें, अपनी तकलीफ़ें — इन सबसे ऊपर उठकर उस विशाल पहेली में डूब जाना। यह एक तरह की मुक्ति थी।
यह रास्ता कठिन था।
पर मैंने कभी पछतावा नहीं किया।
सोचना आख़िर होता क्या है?
अब एक ज़रूरी बात।
जब आँखें कुछ देखती हैं और दिमाग़ में एक तस्वीर बन जाती है — यह सोचना नहीं है। जब एक तस्वीर दूसरी तस्वीर को बुलाती है, और वो तीसरी को — यह भी सोचना नहीं है।
सोचना तब होता है जब कोई एक तस्वीर बार-बार, अलग-अलग मौकों पर आती है। और धीरे-धीरे वो एक धारणा बन जाती है — एक concept। जो अलग-अलग अनुभवों को एक धागे में पिरोती है।
और जब यह धारणा किसी शब्द से जुड़ जाती है — तो इसे दूसरे को बताया जा सकता है। इसी को हम "सोचना और समझाना" कहते हैं।
पहली "चौंक" — कम्पास
जब मैं चार-पाँच साल का था, पिताजी ने मुझे एक कम्पास दिखाया।
वो सुई — वो हमेशा एक ही दिशा में मुड़ जाती थी। चाहे डिब्बा कैसे भी घुमाओ।
मेरे बचपन की दुनिया में जो नियम था वो यह था — कोई चीज़ तभी हिलती है जब उसे छुओ। धक्का दो, तो हिलती है। न दो, तो नहीं।
पर यह सुई? कोई छू नहीं रहा था। कोई धक्का नहीं था। फिर भी वो मुड़ी जा रही थी।
दूसरी "चौंक" — ज्यामिति की किताब
बारह साल की उम्र में स्कूल के शुरुआत में मेरे हाथ एक पतली सी किताब लगी — यूक्लिड की ज्यामिति की।
उसमें लिखा था: किसी भी त्रिभुज की तीनों ऊँचाइयाँ एक ही बिंदु पर मिलती हैं। यह बात देखने में बिल्कुल ज़ाहिर नहीं थी। लेकिन इसे साबित किया जा सकता था — इतनी पक्की तरह से कि शक की कोई गुंजाइश ही नहीं बचे।
यह मुझे अजीब तरह का जादू लगा। इंसान बिना कोई प्रयोग किए — सिर्फ़ सोचकर — इतनी पक्की बात जान सकता है?
बारह से सोलह साल की उम्र में मैंने गणित के बुनियादी हिस्से सीखे — Calculus भी। अच्छी बात यह थी कि मेरे हाथ ऐसी किताबें लगीं जो ज़्यादा पेचीदा नहीं थीं, पर मुख्य विचार साफ़ दिखाती थीं।
Polytechnic — ज्यूरिख़
सत्रह साल में मैं ज्यूरिख़ के Polytechnic में पहुँचा। वहाँ अच्छे गुरु थे — Hurwitz, Minkowski। मैं चाहता तो गणित में बहुत मज़बूत हो सकता था। पर मैंने ज़्यादातर वक़्त Physics की प्रयोगशाला में बिताया। हाथ से काम करना, चीज़ें नापना — यह मुझे बहुत पसंद था।
गणित मैंने थोड़ा नज़रअंदाज़ किया। क्यों? इसलिए नहीं कि गणित बेकार था — बल्कि इसलिए कि गणित में इतनी शाखाएँ थीं कि पूरी ज़िंदगी एक शाखा में निकल जाए। Physics में मैं जल्दी समझ गया कि किस रास्ते पर चलने से असली सवालों तक पहुँचूँगा।
Physics की दुनिया उस वक़्त
उस ज़माने में Physics की दुनिया में Newton के नियम ही सब कुछ थे। माना जाता था — शुरुआत में ईश्वर ने Newton के नियम बनाए, बाकी सब उससे निकलता है।
पर एक नई चीज़ आ रही थी — Maxwell की विद्युत-चुंबकत्व की थ्योरी। यह Newton की तरह "धक्का-खिंचाव" की भाषा में नहीं बोलती थी। यह "क्षेत्र" यानी field की भाषा में बोलती थी।
Maxwell ने बताया कि बिजली और चुंबकत्व असल में एक ही चीज़ के दो रूप हैं। और रोशनी? वो भी एक electromagnetic लहर है। यह मुझे बिल्कुल एक रहस्योद्घाटन जैसा लगा।
Lorentz का योगदान
H.A. Lorentz ने एक बड़ा क़दम उठाया। उन्होंने कहा — असली field सिर्फ़ ख़ाली जगह (space) में होता है। परमाणु बिजली के आवेश हैं। उनके बीच ख़ाली जगह है — वहाँ field है। Field आवेशों से बनता है, और वापस आवेशों पर असर डालता है।
यह Newton की पुरानी "दूर से खिंचाव" वाली बात को field की नई भाषा में बदलना था। उस वक़्त यह बहुत साहसी क़दम था।
Planck का बम — 1900
1900 में Max Planck ने एक काम किया जिसने सब कुछ हिला दिया।
गर्म चीज़ें रोशनी छोड़ती हैं — यह तो पता था। पर कितनी और किस तरह की रोशनी — यह नहीं बताया जा सका था। पुरानी Physics यहाँ फेल हो गई थी।
Planck ने एक गणितीय तरकीब निकाली। उन्होंने कहा — मान लो कि ऊर्जा छोटे-छोटे पैकेट में मिलती है, तो हिसाब बिल्कुल सही बैठता है। पर Planck ख़ुद इसे सिर्फ़ गणितीय चाल मानते थे। यह असलियत में भी होता है — यह उन्होंने नहीं कहा।
मेरा सवाल था — इस radiation के formula से Physics के बारे में आगे क्या नतीजा निकलता है?
Brownian Motion — अणु असल में हैं
पानी में छोटे-छोटे कण रखो। वो बेवजह थिरकते-काँपते रहते हैं। Robert Brown ने यह 1827 में देखा था। पर कोई नहीं समझा पाया था — क्यों?
मुझे नहीं पता था कि Brown ने यह पहले देख लिया था। मैं ख़ुद एक अलग रास्ते से इस नतीजे पर पहुँचा।
मेरा सोचना था — अगर अणुओं का सिद्धांत सच है, तो पानी में तैरते छोटे कण पर हर तरफ़ से अणु टकराते होंगे। वो टक्करें बराबर नहीं होंगी — कभी एक तरफ़ से ज़्यादा, कभी दूसरी से। इसीलिए कण थिरकता है।
और मज़े की बात — इस थिरकन को नापकर अणु का आकार निकाला जा सकता है।
यह एक ज़रूरी सबक़ है — जो दिखता नहीं, वो अपने असर से पकड़ा जाता है।
वो पुराना सवाल — रोशनी के साथ दौड़ो तो?
1900 के बाद यह साफ़ हो गया कि न Newton की यंत्र-भौतिकी, न ऊष्मागतिकी — कोई भी पूरी तरह सच नहीं है।
मैं बहुत कोशिश करता रहा कि जानी-मानी बातों से ही नए नियम निकाल लूँ। पर हर बार हार गया। धीरे-धीरे मुझे यक़ीन हुआ — इस रास्ते से नहीं जाएगा। कोई ऐसा बुनियादी सिद्धांत चाहिए जो सब कुछ एक सूत्र में बाँधे।
और उदाहरण मेरे सामने था — ऊष्मागतिकी का सिद्धांत। उसका मूल नियम है: ऐसी मशीन नहीं बन सकती जो बिना ईंधन के चले। इतनी सीधी-सी बात — पर उससे बहुत कुछ निकलता है।
तो मुझे भी ऐसा ही कोई बुनियादी सिद्धांत चाहिए था। और तभी — दस साल की मेहनत के बाद — वो पुराना सवाल काम आया, जो मैंने सोलह साल की उम्र में पूछा था।
मुझे लगा — रोशनी एक थमी हुई electromagnetic लहर जैसी दिखेगी। पर Maxwell के समीकरण कहते थे — ऐसी थमी हुई लहर हो ही नहीं सकती। रोशनी का मतलब ही है — चलती हुई लहर।
तो दोनों एक साथ सच नहीं हो सकते थे।
चाबी मिली — "एक साथ" का मतलब क्या है?
आज सब जानते हैं कि वो चाबी क्या थी। पर उस वक़्त किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया था।
हम सब एक छिपी मान्यता लेकर चलते थे — समय सबके लिए एक है। पूरे ब्रह्मांड में एक ही घड़ी चल रही है। Newton ने यही माना था। दो सौ साल से किसी ने शक नहीं किया।
पर यह मान्यता ग़लत थी।
और David Hume और Ernst Mach को पढ़ने से मुझे यह शक करने की आदत आई थी — जो "ज़ाहिर" लगे, उसे भी परखो।
तो मैंने पूछा — "एक ही वक़्त पर" इसका मतलब क्या है? दो जगह पर एक ही वक़्त पर कुछ हुआ — यह हम कैसे जाँचेंगे? जाँचने के लिए रोशनी चाहिए, क्योंकि रोशनी ही वो सबसे तेज़ चीज़ है। और रोशनी की एक सीमित रफ़्तार है।
विशेष सापेक्षता — क्या नतीजे निकले
जब यह समझ आई, तो बाकी सब गणित ने अपने आप बता दिया।
रोशनी की रफ़्तार हर हाल में एक ही रहेगी — चाहे तुम उसकी तरफ़ दौड़ो या उससे दूर भागो। इसके लिए समय को लचीला होना पड़ेगा। चलती हुई चीज़ के लिए समय धीमा हो जाता है। चलती हुई चीज़ थोड़ी सिकुड़ जाती है।
और पदार्थ तथा ऊर्जा — ये दो अलग चीज़ें नहीं हैं। एक ही चीज़ के दो रूप हैं।
पदार्थ की ऊर्जा = पदार्थ × रोशनी की रफ़्तार का वर्ग
विशेष सापेक्षता काफ़ी नहीं थी
जैसे ही यह थ्योरी बनी — मुझे दिखा कि इसमें gravity के लिए कोई जगह नहीं है।
Newton की gravity में एक अजीब बात थी — वो कहती थी कि सूरज और पृथ्वी करोड़ों किलोमीटर की दूरी से तुरंत एक-दूसरे को खींचते हैं। कोई माध्यम नहीं, कोई देरी नहीं।
पर मेरी विशेष सापेक्षता कह रही थी — कोई भी असर रोशनी से तेज़ नहीं चल सकता। दोनों बातें एक साथ सच नहीं हो सकतीं। तो gravity की एक नई थ्योरी चाहिए थी।
सबसे खुशनुमा विचार — गिरता आदमी
1907 में मुझे अचानक एक बात सूझी। मैं इसे अपने जीवन का सबसे खुशनुमा विचार कहता हूँ।
अगर कोई आदमी बिना रस्सी के छत से गिरे — तो गिरते हुए उसे अपना वज़न महसूस नहीं होगा। अगर वो जेब से चाबी निकाले और छोड़े — चाबी उसके बगल में तैरती रहेगी। उसके लिए gravity का कोई वजूद नहीं।
दूसरी तरफ़ — मान लो कोई अंतरिक्ष में एक बंद कमरे में बैठा है। और कमरा ऊपर की तरफ़ खिंच रहा है। उसे लगेगा जैसे वो ज़मीन पर खड़ा है। अगर वो गेंद छोड़े — गेंद "नीचे" गिरेगी।
जब तक हम बाहर से न देखें, दोनों में कोई फ़र्क़ नहीं।
सात साल की लड़ाई — 1908 से 1915
1908 में यह बीज पड़ा। सामान्य सापेक्षता पूरी होने में 1915 तक लगे। सात साल।
बड़ी दिक़्क़त यह थी — मुड़ी हुई जगह (curved space) का गणित मुझे आता नहीं था। रीमान की ज्यामिति नाम का एक गणित था जो साठ साल पहले किसी और मक़सद से बना था। पर वही काम आया।
सामान्य सापेक्षता — असल बात
सामान्य सापेक्षता का मूल विचार यह है:
और space-time चीज़ों को बताता है कि कैसे चलना है।
Gravity कोई खिंचाव नहीं है। सूरज ने अपने चारों तरफ़ की जगह को मोड़ रखा है। पृथ्वी उस मुड़ी हुई जगह में सबसे सीधा रास्ता लेती है। और वो सीधा रास्ता गोल निकलता है।
बिल्कुल जैसे एक तनी चादर पर भारी गेंद रखो — चादर धँसती है, और पास से लुढ़कती छोटी गेंद उस गड्ढे में घूमने लगती है।
क्वांटम — मेरा सबसे बड़ा झगड़ा
मुझे अब उस थ्योरी पर कुछ कहना है जो इस दौर की सबसे कामयाब थ्योरी है — क्वांटम यंत्रिकी।
Schrödinger, Heisenberg, Dirac, Born — इन्होंने क्वांटम की पूरी भाषा बनाई। छोटे कणों की दुनिया को समझाने का यही एकमात्र तरीका अभी है। और यह थ्योरी काम करती है — बिल्कुल सटीक।
पर मेरी दिक़्क़त है —
यह थ्योरी कहती है: किसी कण की असली हालत तब तक तय नहीं होती जब तक उसे मापो नहीं। प्रकृति की जड़ में संयोग है। चीज़ें एक साथ कई हालतों में होती हैं।
मैं यह नहीं मान सकता।
मेरा मानना है — Physics को असलियत को उस तरह बताना चाहिए जैसी वो है — हमारे देखे बिना भी।
आख़िरी बात
इस पूरी कहानी को मैंने इसलिए लिखा ताकि दिख सके — एक ज़िंदगी के सारे प्रयास एक-दूसरे से कैसे जुड़े थे। और आगे किस चीज़ की उम्मीद है।
जो सबसे सुंदर थ्योरी होती है — वो वो होती है जिसकी बुनियाद सबसे सरल हो, जो सबसे अलग-अलग चीज़ों को जोड़े, और जो सबसे बड़े दायरे पर लागू हो।
मैं अभी भी उसी सरलता की तलाश में हूँ। और शायद वो तलाश कभी पूरी न हो। पर जो काम मैंने किया — वो इसी दिशा में था।
— अल्बर्ट आइंस्टीन
मूल स्रोत: Autobiographical Notes — Albert Einstein (1949), पहली बार प्रकाशित: Albert Einstein: Philosopher-Scientist, संपादक: Paul Arthur Schilpp, Library of Living Philosophers। यह हिंदी रूपांतर शैक्षिक उद्देश्य से किया गया है।
