अध्याय एक
Würzburg में शुरुआत — 1901
मैं Werner Karl Heisenberg हूँ। 5 दिसंबर 1901 को जर्मनी के Würzburg शहर में पैदा हुआ।
पर असल ज़िंदगी म्यूनिख में शुरू हुई। Würzburg में तो बस पैदा हुआ — जब मैं नौ साल का था, पूरा परिवार म्यूनिख आ गया। वजह थी मेरे पिता — August Heisenberg। वो जर्मनी के उन चंद विद्वानों में से थे जो प्राचीन ग्रीक भाषा के असली जानकार थे। म्यूनिख विश्वविद्यालय ने उन्हें बुलाया — और हम चले आए।
मेरे एक बड़े भाई थे — Erwin। मुझसे सिर्फ़ एक साल बड़े। और पिताजी ने हम दोनों को एक तरह से पाला — जैसे दो घोड़े एक ही रेस में हों। हर चीज़ में होड़ — पढ़ाई में, खेल में, शतरंज में, सब में।
माँ — Anna — वो इस सब में थोड़ी नरमी थीं। पर घर का माहौल बौद्धिक था — हमेशा से। खाने की मेज़ पर Plato की बातें होती थीं। बाहर बवेरिया के पहाड़ों पर चढ़ाई। और पिताजी का एक अटल नियम — जो सोचते हो, उसे साफ़ बोलो। जो नहीं जानते, उसे स्वीकार करो।
अध्याय दो
म्यूनिख का स्कूल और पहली
महायुद्ध — 1910–1919
म्यूनिख में मैं Maximilian Gymnasium में पढ़ा। यह वही स्कूल था जहाँ कभी थॉमस मान भी पढ़े थे।
गणित से मेरा इश्क़ बहुत जल्दी शुरू हुआ। आठ साल की उम्र में मैंने अपने दादा की एक पुरानी किताब पढ़ी — Differential Calculus पर। मुझे ऐसा लगा जैसे एक गुप्त भाषा मिल गई हो। संख्याएँ सिर्फ़ संख्याएँ नहीं थीं — वो कहानियाँ थीं। हरकत थी। दुनिया थी।
पर स्कूल के साल आसान नहीं थे। 1914 में पहला महायुद्ध शुरू हुआ। मैं तेरह साल का था। म्यूनिख में खाने की किल्लत हो गई। हम बच्चों को खेतों पर भेजा जाता था — काम करने के लिए। बवेरिया के गाँवों में किसानों की मदद करो, बदले में थोड़ा खाना मिलेगा।
उन दिनों मेरे हाथ में Plato की किताब होती थी। खेत में काम के बीच पढ़ता। Plato का Timaeus — जिसमें ब्रह्मांड की बनावट का दार्शनिक विवरण है। वहाँ लिखा था कि पदार्थ त्रिभुजों से बना है। मुझे उस वक़्त लगा था — शायद इसमें कुछ सच है। शायद गणित सचमुच इस दुनिया की असली भाषा है।
1918 में युद्ध ख़त्म हुआ। जर्मनी हार गया। सम्राट भाग गए। म्यूनिख में क्रांति आई — लाल झंडे, Soviet Republic, गोलियाँ। और मैं — सत्रह साल का लड़का — उस अफ़रातफ़री में था। मैंने एक दक्षिणपंथी मिलिशिया — Freikorps — में कुछ वक़्त गुज़ारा। यह बात मैं बाद में याद नहीं करना चाहता था। पर सच है। उस उम्र में, उस माहौल में — हम सब कुछ न कुछ थे।
अध्याय तीन
Sommerfeld और Wolfgang Pauli
— 1920
1920 में मैंने म्यूनिख विश्वविद्यालय में दाख़िला लिया। मेरा इरादा था — गणित। शुद्ध, सुंदर, अमूर्त गणित।
तो मैं गया Ferdinand von Lindemann के पास। वो जर्मनी के सबसे प्रतिष्ठित गणितज्ञों में से एक थे — π को अपरिमेय (irrational) साबित करने वाले।
मैंने दरवाज़ा खटखटाया। Lindemann बड़े कुत्ते के साथ बैठे थे। मैंने बताया कि मैं गणित पढ़ना चाहता हूँ, Weyl की किताब पढ़ चुका हूँ।
— Ferdinand von Lindemann, 1920
और बात ख़त्म। शायद Lindemann बहुत बूढ़े हो चुके थे। शायद कुत्ता ज़्यादा था। जो भी हो — गणित का दरवाज़ा बंद हो गया।
थोड़ा निराश होकर मैं गया Physics की तरफ़। Arnold Sommerfeld के पास। और यहीं ज़िंदगी बदली।
Sommerfeld एक अजीब इंसान थे। उनकी मूँछें, उनका रुतबा, उनकी कक्षाएँ — सब कुछ एक ख़ास धज लिए था। पर उनकी असली ख़ूबी यह थी — वो प्रतिभा को तुरंत पहचानते थे। और पहचानते ही उसे रास्ता देते थे।
Sommerfeld के seminar में उस वक़्त एक और लड़का आता था। घुंघराले बाल, तीखी नज़र, और जीभ उससे भी तीखी। उसका नाम था — Wolfgang Pauli। Pauli और मेरी दोस्ती उसी दिन शुरू हुई। और वो दोस्ती — जो असल में एक लंबा, प्यारा, चिड़चिड़ा झगड़ा था — ज़िंदगी भर चली।
अध्याय चार
Bohr की एक झलक — Göttingen
1922
1922 का जून। Sommerfeld अपने पूरे दल को लेकर Göttingen गए। Niels Bohr वहाँ लेक्चर दे रहे थे — इसे "Bohr Festival" कहा जाता था। मैं इक्कीस साल का था। Bohr उस वक़्त दुनिया के सबसे बड़े भौतिकविद थे।
Bohr बोल रहे थे। मैं सुन रहा था। और कहीं उन्होंने एक बात कही जो मुझे ग़लत लगी। एक गणितीय तर्क था — और उसमें एक कमज़ोरी थी।
मैंने हाथ उठाया।
कमरे में सन्नाटा। एक नया लड़का, Sommerfeld का छात्र — Bohr से सवाल कर रहा है?
Bohr रुके। उन्होंने मेरी बात सुनी। और फिर कहा — "यह दिलचस्प है। चलो बाद में बात करते हैं।"
लेक्चर के बाद Bohr ने मुझे बाहर बुलाया। हम पास की पहाड़ी पर चलने लगे। तीन घंटे हम चलते रहे। Bohr ने पूछा — मेरी पढ़ाई कहाँ हुई, मुझे क्या पसंद है। मैंने Plato का ज़िक्र किया। उनकी आँखें चमकीं।
मैं इक्कीस साल का था। और दुनिया के सबसे बड़े वैज्ञानिक ने मुझे अपने पास बुलाया था।
अध्याय पाँच
PhD और एक शर्मनाक परीक्षा —
1923
Max Born के गॉटिंगेन में PhD का काम शुरू हुआ। विषय था — तरल पदार्थों में turbulence। 1923 में PhD पूरी हुई। पर उसके साथ एक शर्मनाक क़िस्सा भी।
PhD की परीक्षा में experimental Physics का भी हिस्सा था। परीक्षक थे Wilhelm Wien — एक कड़क, कठोर प्रोफ़ेसर। उन्होंने पूछा — "टेलिस्कोप की resolving power क्या होती है?" फिर — "Fabry-Perot interferometer कैसे काम करता है?"
मैं theory में बहुत अच्छा था। पर इन तकनीकी ब्यौरों में मैं अटक गया।
अध्याय छह
Copenhagen में Bohr के साथ —
1924
PhD के बाद मैं Copenhagen गया। Bohr का संस्थान — Institute for Theoretical Physics। एक छोटी सी इमारत। पर उसके भीतर विचारों का समंदर था।
Bohr अजीब तरह से काम करते थे। वो लिखते कम थे — बोलते ज़्यादा। मेरे साथ वो अक्सर रात को टहलने निकलते। Copenhagen के घाट पर, पानी के किनारे।
— Niels Bohr, Copenhagen की रात में
यह सवाल मुझे परेशान करने लगा। और धीरे-धीरे मुझे लगने लगा कि यही सबसे बड़ा सवाल है — Physics में हम जो नहीं देख सकते, उसके बारे में क्या सोचें?
अध्याय सात
Helgoland — वो रात जिसने सब
बदल दिया (जून 1925)
मई-जून 1925 में मुझे बहुत बुरी hay fever हुई। आँखें, नाक — सब बंद। सिर भारी। Sommerfeld ने कहा — "जाओ, कहीं बाहर जाओ।"
मैंने सुना था कि North Sea में Helgoland नाम का एक टापू है। वहाँ परागकण नहीं होते। मैं गया।
Helgoland छोटा सा द्वीप है। लाल चट्टानें। नीला समुद्र। वहाँ कोई नहीं था। सिर्फ़ मैं, समुद्र, और एक बड़ा सवाल।
पिछले कई महीनों से मैं एक समस्या पर अटका था। पुरानी quantum theory — Bohr का मॉडल — बहुत सी चीज़ें नहीं बता पाती थी। हाइड्रोजन से ज़्यादा जटिल परमाणुओं के लिए हिसाब ग़लत निकलता था।
उस रात एक विचार आया — अगर हम सिर्फ़ वही चीज़ें Physics में रखें जो सचमुच दिखती हैं? परमाणु की कक्षा — वो नहीं दिखती। पर दो ऊर्जा-स्तरों के बीच transition से निकलने वाली रोशनी — वो दिखती है। Spectrum की रेखाएँ — वो दिखती हैं। तो क्यों न उन्हीं से शुरू करें?
मैंने काग़ज़ उठाया। समीकरण लिखने शुरू किए। संख्याओं को tables में सजाया। एक नया गणितीय ढाँचा।
रात के एक बजे कुछ हुआ। एक equation से एक और निकली। और उससे एक और। और अचानक — सब कुछ मिलने लगा। Energy conservation का नियम — जो Physics का सबसे बुनियादी नियम है — वो मेरे नए framework में अपने आप आ गया।
मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने सोचा — क्या यह सच है? या मैं कोई ग़लती कर रहा हूँ? मैं रात भर जागता रहा। गणित जाँचता रहा। पर हर बार — हिसाब सही निकलता।
अध्याय आठ
Matrix Mechanics — Quantum का
पहला रूप (1925)
Helgoland से लौटकर मैं गॉटिंगेन गया। Born को मिला। मैंने अपने काग़ज़ थमाए। Born ने देखा। देखते रहे।
— Max Born, Göttingen 1925
मैं matrices नहीं जानता था। Born ने मुझे बताया। और फिर शुरू हुई एक असाधारण collaboration। Born, मैं, और Pascual Jordan — तीनों मिलकर।
हमने तीन महीने में पूरा framework खड़ा कर दिया। जुलाई 1925 में मेरा पहला paper। नवंबर 1925 में तीनों का मिलकर एक बड़ा paper — जिसे बाद में "Drei-Männer-Arbeit" यानी "तीन आदमियों का काम" कहा गया।
अध्याय नौ
Schrödinger आ गए — दो भाषाएँ,
एक सच (1926)
1926 की शुरुआत में एक और धमाका हुआ। Erwin Schrödinger ने एक wave equation प्रकाशित किया। उन्होंने दिखाया कि इलेक्ट्रॉन को एक लहर की तरह describe किया जा सकता है। और उनका हिसाब भी काम करता था।
Physics की दुनिया दो टुकड़ों में बँट गई। एक तरफ़ मेरी matrices — abstract, बिना किसी "तस्वीर" के। दूसरी तरफ़ Schrödinger की waves — जिन्हें imagine किया जा सकता था। ज़्यादातर physicists Schrödinger की तरफ़ चले गए।
अध्याय दस
Uncertainty Principle —
फ़रवरी 1927
फ़रवरी 1927। Bohr skiing पर गए थे — Norway में। मैं Copenhagen में अकेला था।
एक सवाल मुझे सताता था। हम कहते हैं — इलेक्ट्रॉन की position और momentum। पर इन शब्दों का असल मतलब क्या है?
रात को मैं Institute के बड़े हॉल में टहल रहा था। और तभी एक विचार-प्रयोग मन में आया।
मान लो हम एक microscope बनाएँ जो इलेक्ट्रॉन की position नापे। इसके लिए हमें उस पर रोशनी डालनी होगी। रोशनी का एक photon इलेक्ट्रॉन से टकराएगा — और उस टकराव में इलेक्ट्रॉन की momentum बदल जाएगी।
जितनी सटीक position नापी, उतनी ज़्यादा momentum बदली। जितनी सटीक momentum रखनी हो, उतनी कम position जान सकते हैं।
यह प्रकृति की बुनियादी सच्चाई थी।
Δx × Δp ≥ ℏ/2
Position की अनिश्चितता गुणा momentum की अनिश्चितता — हमेशा एक न्यूनतम मूल्य से कम नहीं हो सकती।
मैंने paper लिखा। Einstein और Pauli को भेजा।
पर जब Bohr skiing से लौटे — उन्होंने कहा — "Werner, तुम्हारा नतीजा सही है। पर तुम्हारी gamma-ray microscope वाली दलील में एक ग़लती है।" और वो सच कह रहे थे।
हम दोनों के बीच तीन हफ़्ते का भारी तनाव रहा। मैं रोया — हाँ, सचमुच। Bohr के साथ argue करते-करते मैं रो पड़ा। क्योंकि मुझे लगा वो मेरे काम को ग़लत साबित कर रहे हैं।
पर आख़िरकार — नतीजा सही था। दलील को थोड़ा सुधारा। Paper में एक note जोड़ा। और paper publish हुआ।
इसका मतलब है — प्रकृति में कुछ चीज़ें simultaneously defined नहीं हैं। यह हमारी जानने की सीमा नहीं है। यह प्रकृति की ख़ुद की सीमा है। इलेक्ट्रॉन की एक साथ exact position और exact momentum होती ही नहीं। यह सत्य measurement से पहले का है।
अध्याय ग्यारह
Leipzig में सबसे युवा
Professor — 1927
1927 के अंत में मुझे Leipzig विश्वविद्यालय ने बुलाया। Full Professor। मैं छब्बीस साल का था। जर्मनी का सबसे युवा full professor।
Leipzig में मैंने एक school बनाई। दुनिया भर से छात्र आते — Felix Bloch, Rudolf Peierls, Carl Friedrich von Weizsäcker। हम सब मिलकर quantum mechanics को आगे बढ़ाते।
उन्हीं दिनों Copenhagen Interpretation का जन्म हुआ — Bohr और मैं मिलकर। इसका मूल विचार — quantum world में "असलियत" वही है जो हम measure करते हैं। Measurement से पहले कोई "definite reality" नहीं।
मैंने कहा — "शायद ईश्वर पासे खेलता है।"
अध्याय बारह
Nobel Prize — 1932
1932 में मुझे Nobel Prize मिला — Physics में। "Quantum Mechanics के सृजन के लिए।"
पर यह prize थोड़ा अकेला था। Bohr को 1922 में मिल चुका था। Schrödinger और Dirac को 1933 में मिला। और Born को — 1954 में।
अध्याय तेरह
नाज़ी और "Deutsche Physik"
— 1933–1941
1933। Hitler सत्ता में आया। जर्मनी बदल गया। विश्वविद्यालय बदल गए।
मेरे यहूदी मित्र और सहयोगी — Born, Einstein, Franck, Stern — सब देश छोड़ने लगे। मैंने नहीं छोड़ा।
यह निर्णय सबसे मुश्किल था। और आज तक सबसे विवादास्पद। मैंने सोचा — जर्मनी मेरा देश है। युद्ध के बाद भी जर्मनी को physics की ज़रूरत होगी। कोई तो रहे — जो विज्ञान की लौ जलाए रखे। मैं रहूँगा।
पर रहने की क़ीमत थी। Philipp Lenard और Johannes Stark — दोनों Nobel Prize विजेता — उन्होंने एक आंदोलन चलाया — "Deutsche Physik" — जर्मन Physics। इसमें Einstein की relativity "यहूदी Physics" थी। Quantum mechanics "यहूदी Physics" थी। और जो इन्हें पढ़ाए — वो "white Jew" था।
1937 में SS के अख़बार Das Schwarze Korps में मेरे बारे में एक लेख छपा। शीर्षक था — "White Jew in Science"। मुझ पर आरोप — कि मैं "Jewish Physics" पढ़ाता हूँ।
मेरी माँ ने Himmler की माँ को चिट्ठी लिखी। दोनों एक ही hiking club में थीं। Himmler की माँ ने अपने बेटे को मामला सुलझाने को कहा। 1938 में Himmler ने मुझे clear किया। पर शर्त यह थी — Physics पढ़ा सकते हो। Einstein का नाम मत लो।
क्या यह समझौता था? हाँ।
क्या यह ग़लत था? शायद।
क्या मेरे पास कोई और रास्ता था?
यह सवाल मुझे रात को जगाता था।
अध्याय चौदह
परमाणु कार्यक्रम —
Uranverein (1939–1945)
सितंबर 1939। जर्मनी ने Poland पर हमला किया। दूसरा महायुद्ध शुरू।
अक्टूबर 1939 में मुझे Army Ordnance Office ने बुलाया। एक बैठक थी — physicists की। विषय था — nuclear fission। Otto Hahn ने 1938 में uranium atom तोड़ा था। क्या इससे एक बम बन सकता है?
मुझे इस Uranium Club — Uranverein — का हिस्सा बनाया गया। मैं इसका सबसे प्रमुख theorist था। मैंने हिसाब लगाया — bomb के लिए critical mass क्या होगी? मेरा हिसाब था — tonnes। यानी बम बनाने के लिए टनों uranium चाहिए। यह व्यावहारिक रूप से असंभव था।
अध्याय पंद्रह
Bohr से आख़िरी मुलाकात —
Copenhagen 1941
सितंबर 1941। Denmark पर जर्मनी का क़ब्ज़ा था। Bohr Copenhagen में थे। मैं एक conference के बहाने वहाँ गया। पर असली मक़सद था — Bohr से मिलना।
हमारी बातचीत Bohr के घर के बाहर टहलते हुए हुई। मुझे क्या कहना था — यह आज तक clear नहीं है।
मेरा कहना है — मैं Bohr को यह बताना चाहता था कि physicists को nuclear weapons पर एक साथ काम नहीं करना चाहिए। दोनों तरफ़ के — Allied और German। एक नैतिक समझौता।
Bohr का कहना था — Heisenberg यह जानना चाहता था कि हम bomb बना सकते हैं या नहीं। और शायद यह पूछना चाहता था कि Allies भी बना रहे हैं क्या।
Bohr 1943 में भाग गए। फिर Manhattan Project।
मैं और Bohr — दो गुरु-शिष्य जिन्होंने साथ quantum mechanics बनाई — उस दिन के बाद कभी उसी तरह नहीं मिले।
अध्याय सोलह
Farm Hall — वो रात जब
Hiroshima हुआ (1945)
मई 1945। जर्मनी ने हार मान ली। British intelligence के लोग आए। मुझे और नौ और German physicists को उठा ले गए। Belgium, फिर France, फिर England।
Farm Hall — एक पुरानी हवेली। हमें वहाँ रखा गया। "यहाँ रहो। कुछ महीनों में घर जाओगे।"
पर हम नहीं जानते थे — हर कमरे में microphones लगे थे। हमारी हर बात record हो रही थी।
6 अगस्त 1945। रेडियो पर ख़बर आई — Hiroshima। एक American bomb। एक शहर — तबाह।
मुझे पहले विश्वास नहीं हुआ। मैंने कहा — "यह propaganda होगा।" फिर ख़बर confirm हुई।
उस रात — जो Farm Hall की recordings में दर्ज है — मुझे एहसास हुआ कि मेरा critical mass का हिसाब ग़लत था। अगले चंद घंटों में मैंने मन में सही हिसाब लगाया। और पाया — 15 किलोग्राम। टन नहीं।
अध्याय सत्रह
वापसी और Max Planck
Institute — 1946–1957
जनवरी 1946 में हम जर्मनी लौटे। जर्मनी खंडहर था। शहर टूटे। लोग भटके। आत्मा टूटी।
मैंने Göttingen में काम शुरू किया। Max Planck Institute for Physics। उसे खड़ा किया। धीरे-धीरे German science फिर साँस लेने लगी।
1937 में मैंने Elisabeth Schumacher से शादी की थी। हमारे सात बच्चे थे — तीन बेटे, चार बेटियाँ। घर भरा था — शोर था, हँसी थी। यह Physics का कोई formula नहीं दे सकता था।
अध्याय अठारह
Göttingen Declaration —
1957
पर देश में एक नई ख़तरनाक बात हो रही थी। Adenauer सरकार चाहती थी — जर्मनी के पास nuclear weapons हों। "NATO में रहने के लिए ज़रूरी है।" मैं नहीं मान सकता था।
अप्रैल 1957। मैं और अठारह और German physicists — Otto Hahn, Max Born, Carl Friedrich von Weizsäcker — हमने एक साथ एक public घोषणा की। "Göttingen Declaration।"
हमने कहा — हम Nuclear weapons की research में हिस्सा नहीं लेंगे। हम पश्चिम जर्मनी को nuclear armed करने के ख़िलाफ़ हैं। एक tactical nuclear weapon में उतनी ताक़त है जितनी Hiroshima bomb में थी।
Adenauer ग़ुस्से में आए। "यह scientists को politics में बोलने का अधिकार नहीं।"
Declaration काम आया। जर्मनी ने nuclear weapons नहीं बनाए।
अध्याय उन्नीस
Weltformel और Pauli की
विदाई — 1958
1958 में मैंने एक बड़ा दावा किया। "Weltformel" — World Formula। एक single equation जो सब कुछ बताए। सारे कण, सारी शक्तियाँ — एक spinor field से।
Pauli शुरू में उत्साहित थे। हमने मिलकर काम किया। February 1958 में एक radio broadcast — Pauli और मैंने साथ घोषणा की।
पर उसके कुछ हफ़्ते बाद — Pauli ने publicly कहा — "मैं इससे सहमत नहीं। यह theory incomplete है। मैं इसका हिस्सा नहीं हूँ।"
यह धक्का बहुत गहरा था। Pauli — मेरा सबसे पुराना दोस्त — जिसने हमेशा मुझे चुनौती दी थी — उसने इस बार सार्वजनिक रूप से पीठ फेर ली। दिसंबर 1958 में Pauli की मृत्यु हो गई। हम दोनों के बीच वो बात अधूरी रह गई।
अध्याय बीस
Munich, किताबें और आख़िरी
साल — 1958–1976
1958 में Max Planck Institute Munich आ गया। मैं भी Munich आ गया। वही शहर जहाँ सब शुरू हुआ था।
मैंने लिखना शुरू किया।
Physics and Philosophy (1958) — quantum mechanics का दार्शनिक
विवरण।
Der Teil und das Ganze (1969) — "The Part and the Whole" — मेरी
ज़िंदगी की सबसे ज़रूरी बातचीतें। Sommerfeld के साथ। Bohr के साथ। Einstein के
साथ। Pauli के साथ। सब संवाद।
1973 में मुझे kidney cancer हुआ। मैं जानता था — यह आख़िरी लड़ाई है।
1 फ़रवरी 1976। Munich में मेरे घर में — मैं चला गया। उम्र थी — 74 साल।
अध्याय इक्कीस
आख़िरी बात — विरासत
मैंने क्या दिया — यह तय करना मेरा काम नहीं।
Uncertainty Principle। लोगों ने इसका बहुत ग़लत इस्तेमाल किया — Philosophy में, metaphysics में, आध्यात्म में। "सब अनिश्चित है" — यह मैंने नहीं कहा।
Matrix mechanics, Uncertainty Principle, Copenhagen Interpretation — इन तीनों के बिना आज की पूरी technology नहीं होती। Transistor नहीं। Computer नहीं। Laser नहीं। MRI नहीं। Smartphone नहीं।
समुद्र। सूरज। चट्टान। और वो एहसास — कि मैंने प्रकृति के परदे के नीचे कुछ झाँक लिया।
कुछ जो हमेशा से था। कुछ जो हमेशा रहेगा।
बस।
— Werner Heisenberg
5 दिसंबर 1901 — 1 फ़रवरी 1976
मुख्य स्रोत: Werner Heisenberg — Der Teil und das Ganze (Physics and Beyond, 1971) | David Cassidy — Uncertainty: The Life and Science of Werner Heisenberg (1992) | Farm Hall Transcripts, British Intelligence (declassified 1992) | Thomas Powers — Heisenberg's War (1993) | Niels Bohr Archive, Copenhagen
